चंद्रपुर मनपा की सत्ता: जब शांत रणनीति ने शोर मचा दिया
चंद्रपुर महाराष्ट्र
रिपोर्टर:- रमाकांत यादव रिड पब्लिक न्यूज़ भारत
दिनांक:- १० फरवरी २०२६
पूरी खबर:-चंद्रपुर महानगरपालिका में सत्ता का जो गणित आखिर में सामने आया, वह अचानक नहीं था। यह उस राजनीति का नतीजा था, जो कैमरों से दूर और बैठकों के शोर से अलग खेली जाती है। इस पूरे घटनाक्रम को अगर ध्यान से देखा जाए, तो एक बात साफ दिखाई देती है — इस खेल की दिशा और दशा तय करने वाला दिमाग़ एक ही था।
कांग्रेस की स्थिति बाहर से मजबूत दिख रही थी, लेकिन भीतर से बिखरी हुई थी। नगरसेवक थे, पर भरोसा नहीं था। नेतृत्व था, पर पकड़ नहीं थी। ऐसे हालात में सत्ता हाथ से फिसलती है, और ठीक यही हुआ।
भाजपा की ओर देखें तो शुरुआत से कोई उतावलापन नहीं दिखा। न तो जीत के दावे, न ही आक्रामक बयान। लेकिन राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा जरूर थी कि सुधीर मुनगंटीवार पूरे मामले पर लगातार नजर बनाए हुए हैं। चंद्रपुर की राजनीति को समझने वाले जानते हैं कि मुनगंटीवार जब चुप रहते हैं, तब कुछ बड़ा आकार ले रहा होता है।
उबाठा शिवसेना के साथ बातचीत इस पूरे समीकरण की सबसे अहम कड़ी थी। यहाँ न तो दबाव की भाषा चली, न ही जल्दबाजी। सत्ता मिले या न मिले — दोनों विकल्प खुले रखे गए। महापौर पद को लेकर समय-विभाजन का जो फार्मूला सामने आया, वह किसी तात्कालिक मजबूरी का नहीं, बल्कि संतुलित सोच का परिणाम था। यही कारण है कि उबाठा शिवसेना अंततः साथ आई और भाजपा समर्थित महापौर का रास्ता साफ हुआ।
महापौर के चयन के बाद जो बयानबाजी सामने आई, उसने कई सवाल खड़े कर दिए। कुछ लोगों ने इसे व्यक्तिगत पहल का नतीजा बताया, लेकिन सच्चाई यह है कि इतनी बड़ी सत्ता की बाज़ी केवल एक सलाह या एक आदेश से नहीं पलटती। इसके पीछे महीनों की तैयारी, लोगों की नब्ज पहचानने की क्षमता और सही समय पर सही कार्ड खेलने की कला होती है।
यह भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि संगठनात्मक स्तर पर लिए गए कुछ पुराने फैसलों से भाजपा को संख्यात्मक नुकसान उठाना पड़ा। ऐसे में अंतिम क्षण का श्रेय लेना, उस पूरी प्रक्रिया को छोटा करके देखने जैसा है।
आज भाजपा के भीतर जो हलचल है, वह महापौर पद को लेकर नहीं, बल्कि इस सवाल को लेकर है कि असली रणनीतिकार कौन था। कार्यकर्ता यह भली-भांति समझता है कि सत्ता तक पहुँचने का रास्ता किसने बनाया और उस पर चलने का काम किसने किया।
चंद्रपुर महानगरपालिका की यह सत्ता किसी एक दिन का फैसला नहीं, बल्कि सुधीर मुनगंटीवार की शांत, धैर्यपूर्ण और दूरदर्शी राजनीति का परिणाम है।


