रामबाग मैदान बचाव मामला: जनआंदोलन की जीत या नेताओं की श्रेय की लड़ाई?
चंद्रपुर/महाराष्ट्र
रिपोर्टर:- रमाकांत यादव रिड पब्लिक न्यूज़ मिडिया नेटवर्क
दिनांक:-११ मई २०२५
पूरी खबर:-चंद्रपुर के ऐतिहासिक रामबाग मैदान को बचाने के लिए शुरू हुआ संघर्ष अब एक नए मोड़ पर पहुंच चुका है। जहां एक ओर यह मामला जनता और खिलाड़ियों की भावनाओं की जीत माना जा रहा है, वहीं दूसरी ओर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के दो वरिष्ठ नेताओं – विधायक किशोर जोरगेवार और पूर्व मंत्री सुधीर मुनगंटीवार – के बीच इस मुद्दे पर श्रेय लेने की होड़ दिखाई दे रही है।
जिल्हा परिषद की नई इमारत के लिए रामबाग मैदान के एक हिस्से का उपयोग करने का प्रस्ताव आया था, जिसका स्थानीय नागरिकों और खिलाड़ियों ने जोरदार विरोध किया। इसी विरोध को लेकर जिलाधिकारी कार्यालय में आयोजित बैठक में विधायक किशोर जोरगेवार ने तीखा रुख अपनाते हुए कहा – “रामबाग मैदान को हाथ भी न लगाया जाए।” उन्होंने साफ तौर पर प्रशासन को वैकल्पिक जमीन तलाशने की मांग रखी और जनभावनाओं को प्राथमिकता देने पर जोर दिया।
दूसरी ओर, सुधीर मुनगंटीवार ने भी दावा किया कि आठ दिन पहले खिलाड़ियों ने उनसे मुलाकात की थी और उनके हस्तक्षेप के बाद ही यह मुद्दा सुलझा। उन्होंने कहा कि प्रशासन ने उनकी पहल पर बैठक आयोजित की और उनके प्रयासों से ही यह निर्णय लिया गया कि मैदान यथावत रहेगा। साथ ही सरकार मैदान को ‘अधिकारिक खेल मैदान’ घोषित करने की दिशा में भी कदम उठाएगी।
अब सवाल यह उठता है कि जब दोनों ही नेता एक ही पार्टी से हैं और दोनों ने मैदान बचाने में भूमिका निभाई है, तो फिर अलग-अलग दावे क्यों?
एक नेता कहता है – “मेरे दबाव से मैदान बचा,” तो दूसरा कहता है – “मेरे प्रयासों से हल निकला।”
यह स्थिति जनता को सोचने पर मजबूर करती है – “क्या यह सच में जनता के हक की लड़ाई थी या फिर राजनीतिक श्रेय की प्रतियोगिता?”
अगर यही खींचतान आगे भी चलती रही तो इसका फायदा किसी तीसरे को मिल सकता है, जो आने वाले समय में स्थानीय राजनीति में बड़ा बदलाव ला सकता है।
निस्संदेह, रामबाग मैदान को बचाने में जनता की एकजुटता और आंदोलन की अहम भूमिका रही है। लेकिन जनहित के मुद्दों पर नेताओं को मिलकर कार्य करना चाहिए, ना कि एक-दूसरे से आगे निकलने की होड़ में जनता की भावना का राजनीतिक इस्तेमाल करना चाहिए।
जनता सब कुछ देख रही है, और समय आने पर जवाब भी देती है।


