बांबू बदल रहा है आदिवासियों का भविष्य…
सुधीरभाऊ की दूरदृष्टि से बल्लारपुर समेत सम्पूर्ण विदर्भ का हो रहा है विकास
चंद्रपुर/महाराष्ट्र
दि . १५ नवंबर 2024
रिपोर्टर :- मुख्य संपादक रमाकांत यादव रीड पब्लिक न्यूज नेटवर्क
पूरी खबर:-विदर्भ के जंगलों में बेतहाशा बढ़ता बांबू आदिवासियों के लिए एक नई जीवनरेखा बन सकता है, यह विचार अब तक किसी के ध्यान में नहीं आया था। आज बांबू आदिवासी समुदाय के लिए रोजगार सृजन का प्रमुख साधन बन चुका है, और भविष्य में बांबू आधारित उत्पाद और निर्माण व्यवसाय विदर्भ के आदिवासियों के जीवन को बदलने में मदद करेंगे।
महाराष्ट्र में लगभग 10 लाख हेक्टेयर में प्राकृतिक बांबू पाया जाता है। विदर्भ के चंद्रपूर, गडचिरोली, गोंदिया, नागपुर और अमरावती के मेळघाट में बमुश्किल बांबू की काफी मात्रा पाई जाती है। दुनिया में बांबू की लगभग 1200 जातियाँ हैं, जिनमें से भारत में करीब 120 जातियाँ पाई जाती हैं। विदर्भ के मनावेल, कटांग और गोल्डन बांबू प्रमुख हैं, और इनसे फर्निचर, शो-पीस जैसी कई उत्पाद बनाए जा सकते हैं।
बांबू पर से प्रतिबंध हटाए गए
चीन में 70% लकड़ी के स्थान पर बांबू का उपयोग होता है, जबकि भारत में यह अनुपात सिर्फ 10% है। इसे बढ़ाने के लिए, अप्रैल 2018 में केंद्र सरकार ने बांबू मिशन का पुनर्गठन किया। तत्कालीन वन मंत्री आ. सुधीरभाऊ मुनगंटीवार ने विधानमंडल में बांबू के मुद्दे पर बार-बार चर्चा की और बांबू पर से प्रतिबंध हटवाए। साथ ही, चिचपल्ली में बांबू अनुसंधान और प्रशिक्षण केंद्र की स्थापना की। अब इस केंद्र के माध्यम से उद्योगों में बांबू का उपयोग बढ़ाने के साथ-साथ बंजर भूमि पर बांबू की खेती को भी बढ़ावा दिया जा रहा है।
सुधीरभाऊ ने विदर्भ में आदिवासियों के लिए बांबू को आय का स्रोत बनाने के लिए अथक प्रयास किए। इसका परिणाम यह हुआ कि बांबू को भारतीय वन अधिनियम 1927 से “पेड़” की श्रेणी से बाहर कर दिया गया। अब आदिवासियों के लिए बांबू की खेती, कटाई और परिवहन आसान हो गया है। चिचपल्ली स्थित केंद्र में बांबू से विभिन्न उत्पाद बनाने का प्रशिक्षण भी प्रदान किया जा रहा है। राज्य में बांबू खेती को प्रोत्साहित करने के लिए अटल बांबू समृद्धि योजना, वनशेती उप अभियान और वृक्षारोपण जैसे कई कार्यक्रमों की शुरुआत सुधीरभाऊ के कार्यकाल में हुई है।
यह उदाहरण दिखाता है कि यदि नेतृत्व में दूरदृष्टि हो, तो विकास के रास्ते अपने आप खुलने लगते हैं।