मोखळा में विकास नहीं, दारू को प्राथमिकता देने का आरोप, कानून और आदेशों को कुचलने की कोशिश
चंद्रपुर महाराष्ट्र
रिपोर्टर:- रमाकांत यादव रिड पब्लिक न्यूज़ भारत
दिनांक:- २२ जनवरी
पूरी खबर:-चंद्रपुर जिले के मूल तालुका अंतर्गत मोखळा गांव में देशी शराब दुकान के स्थानांतरण को लेकर प्रशासनिक आदेशों, कानून और न्यायालय की प्रक्रिया को खुलेआम नजरअंदाज करने का गंभीर मामला सामने आया है। देशी शराब दुकान का प्रकरण माननीय हाई कोर्ट, नागपुर खंडपीठ में विचाराधीन रहते हुए भी ग्राम पंचायत द्वारा जानबूझकर ग्रामसभा बुलाने का प्रयास किया गया, जो सीधे तौर पर नियमों की अवहेलना माना जा रहा है।
प्रभारी सरपंच सागर देऊरकर द्वारा बीडीओ, पंचायत समिति मूल के स्पष्ट आदेश को दरकिनार करते हुए 19 जनवरी को ग्रामसभा आयोजित करने का निर्णय लिया गया। यह निर्णय न केवल महाराष्ट्र ग्राम पंचायत अधिनियम 1959 की धारा 54(क) का उल्लंघन है, बल्कि न्यायालयीन प्रक्रिया में हस्तक्षेप करने जैसा गंभीर कृत्य भी है। नियमानुसार ग्रामसभा की सूचना कम से कम 15 दिन पहले ग्राम पंचायत सचिव द्वारा दी जानी चाहिए, परंतु इस मामले में नियमों को ताक पर रख दिया गया।
गौर करने वाली बात यह है कि जिस विषय पर ग्रामसभा बुलाने की कोशिश की गई, वही विषय न्यायालय में लंबित है। इसके बावजूद ग्राम पंचायत का यह रवैया यह संकेत देता है कि किसी खास उद्देश्य से जल्दबाजी में फैसला थोपने की कोशिश की जा रही थी। आखिर किस दबाव में और किसके इशारे पर यह नियमविरुद्ध कदम उठाया गया, यह सवाल अब गांव ही नहीं बल्कि पूरे तालुका में चर्चा का विषय बन गया है।
ग्रामीणों का आरोप है कि गांव आज भी शुद्ध पेयजल, खेतों तक जाने वाले रास्तों की बदहाली और मोकाट कुत्तों के आतंक जैसी गंभीर समस्याओं से जूझ रहा है। कई नागरिक मोकाट कुत्तों के हमले का शिकार हो चुके हैं, लेकिन इन ज्वलंत मुद्दों को छोड़कर ग्राम पंचायत द्वारा दारू दुकान को प्राथमिकता देना ग्रामीणों की समझ से परे है।
ग्रामीणों ने सवाल उठाया है कि क्या गांव के बच्चों, महिलाओं और किसानों की सुरक्षा से ज्यादा जरूरी दारू की दुकान है। क्या विकास के नाम पर सिर्फ शराब को बढ़ावा देना ही ग्राम पंचायत का एजेंडा रह गया है। इसी आक्रोश के चलते सैकड़ों ग्रामीणों ने एकजुट होकर शराब दुकान के खिलाफ कड़ा विरोध दर्ज कराया।
इस पूरे प्रकरण में कांग्रेस पार्टी के एक वरिष्ठ कार्यकर्ता ने ग्रामीणों को संगठित कर कानूनी स्थिति से अवगत कराया और यह स्पष्ट किया कि न्यायालय में लंबित विषय पर ग्रामसभा बुलाना अवैध है। ग्रामीणों की जागरूकता और न्यायालय के हस्तक्षेप के कारण अंततः 19 जनवरी की ग्रामसभा रद्द करनी पड़ी।
ग्रामीणों का आरोप है कि यदि समय रहते न्यायालय का हस्तक्षेप नहीं होता तो ग्राम पंचायत द्वारा गैरकानूनी तरीके से निर्णय थोपने की पूरी तैयारी थी। अब ग्रामीणों ने मांग की है कि इस मामले में बीडीओ के आदेश की अवहेलना करने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाए और ग्राम पंचायत की भूमिका की निष्पक्ष जांच हो।